जो बसती थी साँसों की आँहों मे,
वो खो गई चांद की बाहों में
मेरी रातों का जो सपना था
उसके पन में कुछ अपना था
वह अनजाने अलबेली सी
किन्तु नहीं लगती भोली थी
वो छवि जो छप गयी आँखों में
क्यों खो गई चांद की बाहों में
उसने जो पलट कर देखा था
नयनों का जाल को फेंका था
मैं फंस गया नयनों के जालों में
उसके लहराती बालों में …
फिर उलझा सपनों की राहों में
वो खो गई चांद की बाहों में

मुझे आगे उसने बुलाया था
मुझ पर अधिकार जमाया था
प्यार बरसाती मुझपर घनघोर
औ नज़र को रखती दूजी ओर
तब प्रश्न एक आया निगाहों में
वो खो गई चांद की बाहों में
संदेह मन का प्रकट किया मैंने
सीधा ही पूछ लिया मैंने …
क्या दूजों को देखने आना था
क्या मैं केवल एक बहाना था
बोल कौन छिपा तेरी चाहों में
वो खो गई चांद की बाहों में
ये पलक जो तेरे झुके हुए
हैं शून्य पे जाके रुके हुए
या मुझसे तू शर्माई है
इसलिए ये नजर चुराई है
क्यों आई रातों की छाँहों में
वो खो गई चांद की बाहों में
