वो जिन्हें हम पिता कहते, सब दुख हमारे जो हैं सहते
सारे दुख मन में दबाएँ, पर न हमसे कभी कहते वो जिन्हें हम पिता कहते…..
जो बचपन में कांधे बिठा सारा जहां घुमाते हैं
और अक्सर काम से आते गोद में हमें उठाते हैं
कभी थोड़ी सी कड़ाई करते हैं माना सही
पर वही फिर एक दिन लड्डू हमें थमाते हैं
जो सारा जीवन स्वेद बेच खुशियां लेकर आते हैं
अक्सर जिनका प्रेम हम बाहर से देख ना पाते हैं
पिता का प्यार ऊपर से भले दिखता नहीं किंतु
वो ही सदा जीवन सुरक्षा कवच हमें बन जाते हैं
पर कभी भी उफ न कहते, वो जिन्हें हम पिता कहते
वो जिन्हें हम पिता कहते…..
वो जिन्होंने अपने सपने मार डाले हैं कहीं
वो जिन्होंने खुशियां अपने फाड़ डाले हैं सही
वो जिन्होंने हम पर ना कोई भार हैं कभी
वो जिन्होंने घर की नींव चार डाले हैं सभी
वो जिन्होंने तुमसे ज्यादा कुछ कभी मांगा नहीं
वो जिन्होंने तुमसे बस एक चाह रखी आखिरी
वो जिन्होंने देखा सपना तुम ना करना चाकरी
वो जिन्होंने चाहा तुम अपने पैरों खड़े होना कहीं
वो जिन्होंने चिंता की जीवन सफल करना सही
तब जो अधिक सगर्व होते, वो जिन्हें हम पिता कहते
वो जिन्हें हम पिता कहते…..