इसी माह में देखो दो रस का गौरव
इसी माह में सुनो सावन का कलरव
इसी माह में पहले श्रृंगार उत्सव
इसी माह में आगे विरह का दानव
नारी श्रृंगार करती इसी माह में
मन पिया का है हरती इसी माह में
प्यास बुझाती है धरती इसी माह में
सारी नदियां हैं भरती इसी माह में
धरती ग्रीष्म को तजती इसी माह में
प्रकृति हरियाली छजती इसी माह में
मानो आभूषण सजती इसी माह में
जग भी भोले को भजती इसी माह में

इसी माह में हां हां विरहा सताती
इसी माह में याद प्रिया की आती
इसी माह में सीता आंसू बहाती
इसी माह में उर्मिला दुःख सुनाती
इसी माह में काले मेघ गरजते
इसी माह में व्याकुल यक्ष तड़पते
इसी माह में पुर्रवा थे सुलगते
इसी माह में बिछुड़े दिल धड़कते
देखो दो रस का गौरव इसी माह में
सुनो सावन का कलरव इसी माह में
ऐसा केवल है संभव इसी माह में
आपका क्या है अनुभव इसी माह में
