कौन कहता है कि ये पर्वत कभी रोते नहीं
हाँ कहो सैनिक हिमालय के कभी सोते नहीं…
सर्दी में हिमपात हो या हो बारिश में भूस्खलन
प्रकृति का रोष हो या दुश्मनों का हो दलन
कष्ट लाखो झेल कर भी है वो सीमा पर अड़े
या कहो उनके उसूलों के इरादें हैं कड़े
विजय सदा पाई है तुमने बर्फीले तूफानों पर
डंका उनका बजते देखा सूखे रेगिस्तानों पर
हम जो यहां सुरक्षित सोते उनके ही बलिदानों पर
वो जाग सवेरा कर देते हैं देश भक्ति के गानों पर
कौन कहता है कि उनके तन में दिल होते नहीं
हाँ कहो सैनिक हिमालय के कभी सोते नहीं…

सीमा पर विरोधी सेना को धूल कभी चटाना हो
या नक्सलवादी क्षेत्रों में जा चुनाव करवाना हो
प्राकृतिक आपदाओं में जान कहीं बचाना हो
मुश्किल से मुश्किल हालातों में जब हाथ बटाना हो
सेना की कड़ी मेहनत का फल तो हम ही खाते हैं
और फिर राहत पाकर हम उन्हें भूल क्यों जाते हैं
कौन कहता है कि वो जन जन का बोझ ढोते नहीं
हाँ कहो सैनिक हिमालय के कभी सोते नहीं…
पिता जो है राह तकता अपने कुल के वंश की
मां जो चाहे हो कुशल तू हो भले विध्वंस ही
बहन जिसकी राखी को रहती तुम्हारी आस है
भाई को मानो सदा तुम पर अटूट विश्वास है
बेटी पिता सेना में कहती गर्व से यह बात है
प्रिया जिसने फाग, सावन काटे विरह की रात है
उनके संग उनके सखा संबंधियों का प्यार है
उनके उपर उनके एक परिवार का भी भार है
किन्तु उनको तज के देखो है हिमालय पर पड़े
और हजारों फीट ऊपर बेहिचक वो हैं खड़े
कौन कहता है कि वो अपने रिश्तों को खोते नहीं
हाँ कहो सैनिक हिमालय के कभी सोते नहीं…
