माँ ममता की है वो मूरत,
जिससे सुंदर न कोई सूरत।
नौ महीने हमको जनती जो
न जाने कितना तड़पी वो

आँचल के पय से जिसने सिंचा
ललाट पर विजय रेखा खिंचा,
गिरे हम दर्द से चोट खाए उसने
फूंक उसपर मरहम लगाए जिसने,
चॉकलेट देकर काम कराती
दर्द में हमको बाम लगाती,
आज शायद माँ भूखी है
इसलिए घर में रोटी सूखी है,
माँ ममता की है वो मूरत,
जिससे सुंदर न कोई सूरत।
