वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर
जी ले तू जिंदगी सबको भुलाकर,
जीते हैं लाखों हजारों यहां पर
जब तक तू दूजों का सुनता रहेगा
ख्यालों का बीज बुनता रहेगा
तब तक न पायेगा तू राह राही
बन जा तू अपने मन का सिपाही
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर,
चढ़ जा तू पर्वत हिम्मत बढ़ाकर।

श्रम कर तू उतना असंभव हो जितना
कि मंजिल भी चाहे खुद तुझसे मिलना
डुब जा भूतल की गहराइयों में
भेजे सागर तुझे मोती बनाकर
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर,
जी ले तू जिंदगी धुन गुनगुनाकर।
अपने ऊपर तू विश्वास रखना
अपनी भुजाओं का स्वाद चखना
कभी न तू लेना छल का सहारा
सच्चाई की राहों पर तू चलाकर
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर,
वर्ना तू खो देगा मंजिल तक जाकर।
कष्टों से लड़कर न रोना पड़ेगा
न जाने अपनों को खोना पड़ेगा
तब तू यदि धैर्य रख पाएगा
पाना सुख संसार के दिल पे छाकर
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर,
जी ले जिंदगी गम को तू खाकर।
जिस दिन तू पंख अपने फैलायेगा
ध्रुव सा तू आकाश जगमगाएगा
खुश होगी दुनिया तुझको अपनाकर
मानो आनन्दित नदी सागर समाकर
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर,
जी ले जिंदगी खुद को भुलाकर
वो साहिल की लहरें कहतीं हैं आकर।
जी ले तू जिंदगी सब कुछ भुलाकर।।
