अमर्त्य वीर

है कथा यह वीर की, जो कष्टों से लड़ते खो गया

है कथा उस वीर की, जो बीज कितने बो गया

है कथा उस वीर की, जो पाप अपने ढो गया

है कथा यह वीर की, जो दुख को सुनाते रो गया

है कथा उस वीर की, जो कुरुक्षेत्र में सो गया

हैे कथा यह वीर की, नि:अस्त्र होकर वो गया

है कथा यह वीर की, छल में समाकर जो गया

है कथा उस वीर की, अमर इतिहास में जो हो गया

हुए हों भले विजयी अर्जुन, किन्तु कर्ण वहीं वीरों में वीर 

अजेय वीर, वह सुर्यपूत्र, उससे न बड़ा कोई दानवीर

जो कुंती ने उसका त्याग किया, पा नहीं सका माँ की छाया

हृदय में ममता भाग्य भी जागे, फिर राधा ने उसको पाया

किया कर्ण इतिहास स्मरण, एकलव्यकथा उसे ध्यान आई

परशुराम के जा समक्ष, उनसे गुरु की दिक्षा पाई

जब सत्य कर्ण का ज्ञात हुआ, हो क्रुद्ध उसे भी शाप दिया

सिर पाप वीर अपने ढोया, तब सब देकर ब्रम्हास्त्र लिया

रण में पहुँचे जब कर्णधीर, अर्जुन को जा ललकारा

तब शांत रहो ऐसा कहकर, गुरु ने दिया इशारा

फिर छोड़ा बाण कृपाचार्य ने, मुख खोल भेद अभेद किया

पुछकर कर्ण का जाति वंश, हृदय वीर का छेद दिया

सुन बात कुपित हो गया वीर, धीरज खोकर वह बोला

देंगे प्रमाण ये धनुष बाण, जब उगलेंगे यह ज्वाला

तभी वहाँ दूर्योधन आया, दे दिया कर्ण को अंग प्रदेश

हो चकित वीर रोए गले लगा, हुए कर्ण के मित्र विशेष

हरि ने रण का एलान किया, जब हुआ पूर्ण अज्ञात वास

और दुर्योधन भी नहीं माना, तब लगी कर्ण से उनकी आस

लौटते कर्ण पर नजर पड़ी, जा पहुंचे उन्हें मनाने को

कृष्ण ने तब मौका पाकर, फिर लगे इतिहास सुनाने को

विश्वास है दुर्योधन का तू, मैं तुझे राज एक आज बताता 

तू भी कुंती का एक पूत, ये पांडव है तेरे भ्राता

संकोच में आकर पड़े वीर, जब सत्य सामने आन खड़ी

जीवन के कष्ट जो याद आए, क्रोध में पीड़ा फूट पड़ी

क्या-क्या उसने न कोसा, मां को नागिन नाम दिया

जैसे मां ने त्यागा मुझको, दुश्मन का ही तो काम किया

सच है दुर्योधन को आस, विश्वास भला क्या तोडूंगा

अकेले में साथ दिया उसने, कैसे मैं उसको छोडूंगा

फिर कवच और कुंडल मांगे, उसका भी हंसकर दान किया

जिससे प्रसन्न हो देवराज ने, अमोघ अस्त्र वरदान दिया

रण आया कल घनघोर खड़ा, फिर मां उनके सम्मुख आई

देखा हृदय खिन्न कर्ण का, कल के बीते दुख बतलाई

तू भी है मेरा ही पूत, पांडवों का है तू ज्येष्ठ

हो विरुद्ध मत करो युद्ध, मुझे चाहिए दोनों श्रेष्ठ

कह पड़े वीर एक बात अटल, किसी एक को तो मरना होगा

या मुझको या अर्जुन को, तुझे दान एक करना होगा

बज उठा युद्ध आरंभ नाद, जब पता चला तब बात चली

बरसे राधेय घातक बनकर, हाहाकार मची थी गली-गली

भयभीत हुई सेना सारी, महाघोर रूप लिया था रण

बहे रक्त जब चले बाण, घनघोर कर्ण गरजे हर क्षण

अकस्मात एक कार्य हुआ, रथ कर्ण का जा कहीं फंसा

सब जोर लगाते थे जितना, उतना ही वह जा रहा धंसा

सब हारे जोर लगा करके, तब रथ से कर्ण उतर आए

हुआ न जाने क्या पहिए को, ना बाहु से वीर उठा पाए

जब फंसे रहे राधेय रथ में, केशव ने पार्थ से कहा तभी

फिर दूजा क्षण नहीं आएगा, यदि मारेगा तू नहीं अभी

तब जगा वो अर्जुन खड़ा हुआ, ले हाथ धनुष को दिया तान

उधर खड़ा नि:अस्त्र कर्ण, वे साध रहे बाणों पे बाण

कह पड़े कर्ण धैर्य रख तू, अवसर वो भी लाऊंगा मैं

थम जा तू थोड़े काल को, समक्ष स्वयं आऊंगा मैं

थे कृष्ण तब भी भौंह सिकोड़े, चल रहे बाण बीच कर्ण खड़ा

इतने में एक शर उसे लगा, सिर अलग धर से गिरा पड़ा

शांत आकाश से पाताल तक था, छिप गया सूर्य भी जा बादलों में

उदासी छा गई चाहुंओर देखो, थम गया शोर पक्षियों के दलों में

यह खेल अनोखा शब्दों का, दिनकर ने रचा जो रश्मि अमर

रोमांच भरा हर छंदों में, दिख रहा जिसमें था दृश्य समर

विचार मन में ऐसा जागा, रच दूं अनुपम अद्भुत प्रसंग

सोच यह रोम-रोम थर्राया, कांपा हृदय संग अंग अंग

इतिहास का रूप दिखता है भयानक, कथा का है यह वर्णन जो घटी थी

नमन है वीर को शत-शत हमारा, छलों से वीर के गर्दन कटी थी।